अथर्ववेद – Atharvaveda – 4:37 – कृमिनाशन सूक्त

अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्

[३७- कृमिनाशन सूक्त]

[ ऋषि – बादरायणि। देवता – अजशृङ्गी ओषधि, ३-५ अप्सरासमूह, ७-१२ गन्धर्व- अप्सरासमूह। छन्द – अनुष्टुप, ३ त्र्यवसाना षट्पदा त्रिष्टुप्, ५ प्रस्तार पंक्ति,७ परोष्णिक, ११ षट्पदा जगती, १२ निवृत् अनुष्टुप् ।]

इस सूक्त में ओषधि एवं मंत्र प्रयोग के संयोग से कृमियों के नाश का वर्णन है। मंत्रों में रोगोत्पादक विषाणुओं के लिए रक्ष राक्षस, गन्धर्व, अप्सरस् पिशाच आदि सम्बोधनों का प्रयोग किया गया है। वैद्यक ग्रन्थ (माधव निदान) में गन्धर्वग्रह पिशाचग्रह रक्ष आदि से पीड़ित रोगियों के लक्षण दिए हैं। उनके उपचार की ओषधियों का भी वर्णन है। वैद्यक ग्रन्थों में वेद में वर्णित ओषधियों के नाम मिलते हैं। उनके जो गुण कहे गए हैं, वेद में वर्णित गुणों से उनकी संगति कहीं बैठती है, कहीं नहीं बैठती। यह शोध का विषय है कि किस प्रकार उनके वेद वर्णित प्रभाव प्राप्त किए जा सकते हैं-

८७८. त्वया पूर्वमथर्वाणो जघ्नू रक्षांस्योषधे।
त्वया जघान कश्यपस्त्वया कण्वो अगस्त्यः॥१॥

हे ओषधे! सर्वप्रथम ‘अथर्वा’ ऋषि ने आपके द्वारा राक्षसों (रोगकृमियो) को विनष्ट किया था। ‘कश्यप’ ‘कण्व’ तथा ‘अगस्त्य’ आदि ऋषियों ने भी आपके द्वारा रोगाणुओं को विनष्ट किया था, ऐसा हम भी करते हैं॥१॥

८७९. त्वया वयमप्सरसो गन्धर्वांश्चातयामहे। अजशृङ्ग्यज रक्षः सर्वान् गन्धेन नाशय॥२॥
हे अजश्रृंगी ओषधे! आपके द्वारा हम उपद्रव करने वाले गन्धर्वो तथा अप्सराओं (दुर्गंध तथा पानी से उत्पन्न कृमियो) को विनष्ट करते हैं। आपकी तीव्र गंध से हम समस्त रोगरूप राक्षसों को दूर करते हैं॥२॥

[गन्धर्व वायु को भी कहते हैं। वायु से फैलने वाले (गन्धर्व) तथा जल से फैलने वाले(अप्सरस्) रोगाणुओं के उपचार के लिए अजशृंगी (काकड़ासिंगी) ओषधि के प्रयोग की बात कही गई है। मलेरिया (शीत ज्वर) के कृमि पानी में ही पनपते हैं, ऐसे कृमियों को अप्सरस् कह सकते हैं।]

८८०. नदी यन्त्वप्सरसोऽपां तारमवश्वसम्। गुल्गुलू: पीला नलद्यौ३क्षगन्धिः प्रमन्दनी।
तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन॥३॥

जिस प्रकार नदी के पार उतरने की इच्छा वाले मनुष्य कुशल नाविक के पास जाते हैं, उसी प्रकार गुग्गुल, पीलु, नलदी, औक्षगंधी और प्रमोदिनी आदि ओषधियों के हवन से भयभीत होकर अप्सराएँ (जल से उत्पन्न कृमि) वापस लौटकर अपने निवास स्थान पर चली जाएँ और गतिहीन होकर पड़ी रहें॥३॥

[ओषधियों में गुग्गुल (गूगल) को सब जानते हैं। पीला = पीलु को हिन्दी में ‘झल’ कहते हैं। नलद = नलदी को माँसी या जटामांसी कहते हैं। औक्षगंधी- जटामांसी का ही एक भेद है, जिसे गंधमाँसी कहते हैं। प्रमोदिनी को धात की वृक्ष या ‘धावई’ कहा जाता है।]

८८१. यत्राश्वत्था न्यग्रोधा महावृक्षाः शिखण्डिनः। तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन॥४॥
हे अप्सराओ (जल में फैलने वाले कृमियो) ! जहाँ पर पीपल, वट और चिलखन आदि महान् वृक्ष होते हैं, वहाँ से आप अपने स्थान में लौट जाएँ और गतिहीन होकर पड़ी रहें॥४॥

[पीपल को संस्कृत में ‘शुचिद्रुम’ (शुद्ध करने वाला) भी कहते हैं। यह रोगाणु निवारक होने के साथ ही दिन-रान आक्सीजन छोड़कर वायु को शुद्ध करने वाला है।]

८८२. यत्र वः प्रेढा हरिता अर्जुना उत यत्राघाटा: कर्कर्यः संवदन्ति।
तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन॥५॥

हे अप्सराओ (जल में उत्पन्न कृमियो) ! जहाँ पर आपके प्रमोद के लिए हिलने वाले हरे-भरे अर्जुन तथा श्यामल वृक्ष हैं और जहाँ पर आपके नृत्य के लिए कर-कर शब्द करने वाले कर्करी वृक्ष हैं, उस स्थान में आप वापस चली जाएँ और गतिहीन होकर पड़ी रहें॥५॥

८८३. एयमगन्नोषधीनां वीरुधां वीर्यावती। अजशृङ्गयराटकी तीक्ष्णशृङ्गी व्यूषतु॥६॥
विशेष प्रकार से उगने वाली लताओं में यह अत्यन्त बलशाली अजशृंगी कंजूसों और हिंसकों को उच्चाटन (उद्विग्न) करने वाली है। तीव्र गंधवाली और शृंगाकार फलवाली अजशृंगी पिशाचरूपी रोगों को नष्ट करे॥६॥

८८४. आनृत्यतः शिखण्डिनो गन्धर्वस्याप्सरापतेः।
भिनद्भि मुष्कावपि यामि शेपः॥७॥

मोर के सदृश नृत्य करने वाले, गीतमय वाणियों वाले और हमें मारने की इच्छा वाले अप्सरापति गंधर्वो के अण्डकोशों को हम चूर्ण करते हैं और उनके प्रजनन अंगों को विनष्ट करते हैं॥७॥

८८५. भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतमृष्टीरयस्मयीः।
ताभिर्हविरदान् गन्धर्वानवकादान व्यूषतु॥८॥

इन्द्र के लौह निर्मित हथियारों, जिनसे प्राणी भयभीत होते हैं और जिसमें सैकड़ो धारे हैं, उसके द्वारा ‘अवका’ (सिवार) खाने वाले गन्धर्वो (कृमियों) को इन्द्रदेव नष्ट करें॥८॥

८८६.भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतमृष्टीहिरण्ययीः।
ताभिर्हविरदान् गन्धर्वानवकादान् व्यूषतु॥९॥
इन्द्र के स्वर्ण विनिर्मित हथियारों से, जिनसे प्राणी भयभीत होते हैं और जिनमें सैकड़ों धारें हैं, उसके द्वारा अवका (सिवार, शैवाल) खाने वाले गन्धर्वो को वे विनष्ट करें॥९॥

८८७. अवकादानभिशोचानप्सु ज्योतय मामकान्।
पिशाचान् सर्वानोषधे प्र मृणीहि सहस्व च॥१०॥

हे अजशृंगी ओषधे! शैवाल (काई-फंगस) खाने वाले, चारों तरफ से चमकने वाले और दःख देने वाले गन्धर्वो को जलाशयों में आप प्रकट करें।आप उपद्रव करने वाले पिशाचों को विनष्ट करें और उन्हें दबाएँ॥१०॥

८८८. श्वेवैकः कपिरिवैकः कुमारः सर्वकेशकः।
प्रियो दृश इव भूत्वा गन्धर्वः सचते स्त्रियस्तमितो नाशयामसि ब्रह्मणा वीर्यावता॥११॥

(इनमें से) एक (एक प्रकार के रोगाणु ) कुत्ते के समान, एक बन्दर के समान और एक बालयुक्त बालक के समान होते हैं। ये गन्धर्व प्रिय दिखने वाले होकर स्त्रियों को प्राप्त (स्त्री रोगों के कारण) होते हैं। हम मंत्र बल द्वारा उन गन्धर्वो को इन स्त्रियों के पास से दूर करते हैं ॥११॥

८८९. जाया इद् वो अप्सरसो गन्धर्वाः पतयो यूयम्।
अप धावतामा मान्मा सचध्वम्॥१२॥

हे गन्धर्वों (वायु में फैलने वाले) ! आप की अप्सराएँ (जल में विकसित) आपकी पत्नियाँ हैं और आप ही उनके पति हैं, इसलिए आप सब यहाँ से दूर हट जाएँ। आप अमरत्व धर्मी होकर मरणधर्मी मनुष्यों से न मिलें॥१२॥

– वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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