अथर्ववेद संहिता (AtharvaVeda)

भूमिका – महत्त्व एवं उपयोगिता

वेद के प्रत्येक विभाग की तरह अथर्ववेद की अपनी कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं, जिनके आधार पर अनेक वेदज्ञ उसे अतुलनीय मानते हैं । वेद की अन्य शाखाओं में अपनी-अपनी विशिष्ट दिशाएँ हैं, किन्तु अथर्ववेद तो अपने अंक में मानो जीवन की समग्रता को समेटे हुए है। सृष्टि के गूढ़ रहस्यों, दिव्य प्रार्थनाओं, यज्ञीय प्रयोगों, रोगोपचार, विवाह, प्रजनन, परिवार, समाज-व्यवस्था एवं आत्मरक्षा आदि जीवन के सभी पक्षों का इसमें समावेश है । वेद की अन्य धाराओं में गूढ़ ज्ञान के साथ शुद्ध विज्ञान (प्योर साइंस) है; किन्तु अथर्ववेद में ज्ञान-विज्ञान की गूढ़ धाराओं के साथ व्यावहारिक विज्ञान (एप्लाइड साइंस) भी है।

जीवन को सुखमय तथा दुःखविरहित बनाने के उद्देश्य से ऋषियों ने जिन यज्ञीय अनुष्ठानों का विधान बनाया है, उनके पूर्ण निष्पादन के निमित्त जिन चार ऋत्विजों की आवश्यकता बताई है, उनमें से अन्यतम (प्रमुख) ऋत्विज् बह्मा का प्रत्यक्ष सम्बन्ध इसी वेद से है। “ब्रह्मा” का स्थान यज्ञ-संसद के ऋत्विजों में प्रधान (अध्यक्ष) है। ‘ब्रह्मा’ का दायित्व यज्ञीय नाना विधियों का निरीक्षण तथा त्रुटियों का परिमार्जन करना है। इसके लिए उसको सर्ववेदविद् होना अनिवार्य होता है तथा उसे मनोबल-सम्पन्न भी होना चाहिए। गोपथ ब्राह्मण का कथन है कि तीनों वेदों के द्वारा यज्ञ के केवल एक पक्ष का संस्कार होता है । ‘ब्रह्मा’ मन के द्वारा यज्ञ के दूसरे पक्ष का संस्कार करता है।

ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार यज्ञ सम्पादन के दो मार्ग हैं- वाक् तथा मन । वाक् (वचन) के द्वारा वेदत्रयी (ऋक्, यजु, साम) यज्ञ के एक पक्ष को संस्कारित करती है, दूसरे पक्ष का संस्कार ‘ब्रह्मा’ ब्रह्मवेद (अथर्ववेद) के द्वारा ‘मन’ से करता है। इस तथ्य से स्पष्ट है कि यज्ञ के पूर्ण संस्कार के लिए अथर्ववेद की नितान्त आवश्यकता है।

वस्तुत: अथर्ववेद में शान्ति-पुष्टि तथा आभिचारिक- दोनों तरह के अनुष्ठान प्रयोग वर्णित हैं। राजा के लिए इसका विशेष महत्त्व स्वीकार किया गया है। राजा के लिए शान्तिक – पौष्टिक कर्म तथा तुलापुरुषादि महादान की विशेष आवश्यकता पड़ती है। जो अथर्ववेद का मुख्य प्रतिपाद्य है। मत्स्य पुराण का कहना है कि पुरोहित को अथर्वमन्त्र तथा बाह्मण में पारंगत होना चाहिए। अथर्वपरिशिष्ट में तो यहाँ तक लिखा है कि अथर्ववेद का ज्ञाता शान्तिकर्म का पारगामी (पुरोहित) जिस राष्ट्र में रहता है, वह राष्ट्र उपद्रवों से हीन होकर वृद्धि को प्राप्त करता है। इसलिए राजा को चाहिए कि वह अथर्ववेदविद् तथा जितेन्द्रिय पुरोहित का दान-सम्मान, सत्कारपूर्वक नित्यप्रति पूजन-अर्चन करे।

अथर्ववेद की इसी महत्ता को ध्यान में रखकर सम्भवत: कुछ आचार्यों ने इसे प्रथम वेद के रूप में स्वीकारा है।

न्याय मञ्जरी कर्ता जयन्त भट्ट ने लिखा है- तत्र वेदाश्चत्वारः प्रथमोऽथर्ववेदः (न्याय मंजरी पृ०२३७-२३८ चौ० प्र०)। नागर खण्ड भी इसे आद्यवेद मानते हुए तर्क देता है कि सार्वलौकिक कार्यसिद्धि में अथर्व ही मुख्य रूपेण प्रयुक्त होता है, इसलिए वह ‘आद्य’ कहलाता है । ऐहिक जगत् के लिए फलदायक होने से भी इसे ‘आद्य’ कहते होंगे, जबकि अन्य तीनों वेद पारत्रिक-आमुष्मिक (पारलौकिक) फलदायक होने से दूसरे स्थान पर आते हैं। आचार्य सायण ने तो अपने अथर्ववेद की भूमिका में यहाँ तक लिखा है कि आमुष्मिक (पारलौकिक) फलदायी वेदत्रयी की व्याख्या के बाद, ऐहिक (ऐहलौकिक) और आमुष्मिक दोनों प्रकार के फल प्रदान करने वाले चतुर्थ वेद (अथर्ववेद) की व्याख्या करूंगा।’

अथर्ववेद के अनेक अभिधान

अथर्ववेद के अनेक अभिधान (नाम) वैदिक वाङ्मय में प्राप्त हैं, यथा-अथर्ववेद, ब्रह्मवेद, अमृतवेद, आत्मवेद, अंगिरोवेद, अथर्वाङ्गिरस वेद, भृग्वांगिरसवेद आदि। अथर्व का निर्वचन प्रस्तुत करते हुए निरुक्त का कथन है – ‘थर्व’ धातु कुटिलता (थर्व कौटिल्ये), गतिशीलता, हिंसा आदि अर्थों में प्रयुक्त होती है। अतएव ‘अथर्व’ का अर्थ हुआ अकुटिलता तथा अहिंसावृत्ति से चित्त की स्थिरता प्राप्त करने वाला। ‘अथर्वन्’ का एक अर्थ अग्नि को उद्बोधित करने वाला ‘पुरोहित’ भी होता है । सम्भवत: ‘अवेस्ता’ का ‘अथ्रवन्’ (अग्निपूजक) शब्द ‘अथर्वन्’ का प्रतिनिधित्व करता है।

अथर्ववेद को ‘ब्रह्मवेद’ भी कहते हैं । वस्तुत: यह वेद ‘यज्ञ संसद’ के प्रमुख ‘ब्रह्मा’ के प्रयोगार्थ निर्धारित है। वैसे ‘ब्रह्मा’ के लिए चारों वेदों का निष्णात होना विहित है; परंतु ‘अथर्ववेद’ की विशेषज्ञता उनके लिए अनिवार्य है क्योंकि ‘ब्रह्मवेद’ में वह सब कुछ है, जो चारों वेदों में पृथक्-पृथक् प्राप्त होते हैं ( ब्रह्मवेद एव सर्वम् – गो०ब्रा० १.५,१५) ।

अतएव ‘ब्रह्मा’ के ‘ब्रह्मकर्म’ की प्रमुखता के कारण इसे ‘ब्रह्मवेद’ की अन्वर्थ संज्ञा प्राप्त है । गोपथ ब्राह्मण, छान्दोग्योपनिषदादि ग्रन्थों में भी अथर्ववेद को ब्रह्मवेद की संज्ञा प्रदान की गई है।

‘अथर्व’ की प्राचीन संज्ञा ‘अथर्वांगिरस वेद’ भी है। इससे इसका सम्बन्ध ‘अथर्व’ और ‘अंगिरा’ दो ऋषिकुलों से संयुक्त प्रतीत होता है। वस्तुत: अंगिरावंशीय अथर्वा ऋषि के द्वारा प्रस्तुत रूप प्रदान किये जाने के कारण इस वेद को ‘अथर्वांगिरस वेद’ कहा जाता है । यहाँ पर एक बात और ध्यातव्य है कि ‘अथर्व दृष्ट’ मन्त्र शान्ति और पुष्टि कर्मयुक्त हैं और अंगिरस्-दृष्ट मन्त्र आभिचारिक हैं। प्रथमत: शान्ति – पौष्टिक मन्त्र हैं, बाद में आभिचारिक मन्त्रों का समावेश है। इसलिए अथर्वांगिरस (अथर्व + अंगिरस) संज्ञा सार्थक है।

‘अथर्ववेद’ को ‘भृग्वांगिरस वेद’ भी कहते हैं। ‘भृगु’ अंगिरा के शिष्य थे। अथर्ववेद के प्रचार-प्रसार का प्रमुख श्रेय ‘भृगु’ को ही प्राप्त है, अत: इसे भृग्वांगिरस वेद की संज्ञा प्राप्त हई और सर्वश्रेष्ठता भी- एतद्वै भूयिष्ठं ब्रह्म यद् भृग्वंगिरसः (गो०ब्रा० १.३.४)

अथर्ववेद की उक्त संज्ञाओं के अतिरिक्त कुछ और भी संज्ञाएँ हैं -यथा, छन्दोवेद (छन्दांसि-अथर्व० ११.७.२४), महीवेद (ऋच: साम यजुर्मही- अथर्व० १०.७.१४), क्षत्रवेद (उवथं -यजु…साम… -क्षत्रं…- वेद-शत० ब्रा०१४.८.१४. २-४) तथा भैषज्य वेद (ऋच: सामानि भेषजा। यजूंषि होत्रा ब्रूम:- अथर्व०११.६.१४)। अथर्ववेद के ये सभी अभिधान उसके व्यापक वर्ण्य विषय को स्पष्ट करते हैं।

अथर्ववेद – तीन संहिताएँ

अथर्ववेदीय कौशिक सूत्र के दारिल भाष्य में अथर्ववेद की तीन संहिताओं का उल्लेख पाया जाता है, जबकि अन्य तीनों वेदों की एक-एक संहिता ही उपलब्ध होती है, जिसका मुद्रण-प्रकाशन होता रहता है।

दारिल भाष्य में अथर्व की जिन तीन संहिताओं का उल्लेख है, उनके नाम हैं -(i) आर्षी-संहिता (ii) आचार्य संहिता और (i) विधि-प्रयोग संहिता।

आर्षी संहिता – ऋषियों के द्वारा परम्परागत प्राप्त मंत्रों के संकलन को ‘आर्षी संहिता’ कहा जाता है। आजकल काण्ड, सूक्त और मंत्रों के विभाजन वाला जो अथर्ववेद उपलब्ध है, जिसे शौनकीय संहिता भी कहा जाता है, ऋषि संहिता या आर्षी – संहिता ही है।

आचार्य संहिता – दारिल भाष्य में इस संहिता के संदर्भ में उल्लेख है कि उपनयन संस्कार के बाद आचार्य अपने शिष्य को जिस रूप में अध्ययन कराता है, वह आचार्य संहिता कहलाती है।

विधि प्रयोग संहिता – जब मंत्रों का प्रयोग किसी अनुष्ठेय कर्म के लिए किया जाता है, तो एक ही मंत्र को कई पदों में विभक्त करके अनुष्ठेय मन्त्र का निर्माण कर लिया जाता है, तब ऐसे मन्त्रों के संकलन को विधि-प्रयोग संहिता कहते हैं । *विधि प्रयोग संहिता* का यह प्रथम प्रकार है। इसी भाँति इसके चार प्रकार और होते हैं। द्वितीय प्रकार में नये शब्द मन्त्रों में जोड़े जाते हैं। तृतीय प्रकार में किसी विशिष्ट मन्त्र का आवर्तन उस सूक्त के प्रतिमंत्र के साथ किया जाता है । इस प्रकार सूक्त के मंत्रों की संख्या द्विगुणित हो जाती है। चतुर्थ प्रकार में किसी सूक्त में आए हुए मंत्रों के क्रम को परिवर्तित कर दिया जाता है। पंचम प्रकार में किसी मंत्र के अर्ध भाग को ही सम्पूर्ण मन्त्र मानकार प्रयोग किया जाता है ।

निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि आर्षी-संहिता मूल संहिता है । आचार्य संहिता उसका संक्षिप्तीकरण रूप है और विधि-प्रयोग संहिता उसका विस्तृतीकरण रूप।

अथर्ववेद का शाखा विस्तार

अन्य वेदों की तरह ‘अथर्ववेद’ की भी एकाधिक शाखाओं का उल्लेख मिलता है। सायण भाष्य के उपोद्धात, प्रपञ्च हृदय, चरण व्यूह (व्यासकृत) तथा महाभाष्य (पतंजलिकृत) आदि ग्रन्थों में अथर्ववेद की शाखाओं का उल्लेख पाया जाता है। महर्षि पतंजलि के महाभाष्य में अथर्ववेद की ‘नौ’ शाखाओं का उल्लेख है – नवधा ऽऽथर्वाणो वेदः (म० भा० पस्प० १.१.१)।

सर्वानुक्रमणी (महर्षि कात्यायनकृत) ग्रन्थ में इस संबंध में दो मत उद्धृत किये गये हैं। प्रथम मत के अनुसार पन्द्रह शाखाएँ हैं। वेदों की शाखाओं का प्रामाणिक वर्णन प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थ ‘चरण व्यूह’ में अथर्व संहिता के ‘नौ’ भेद स्वीकार किये गये हैं, जो इस प्रकार हैं-

  • १. पैप्पल
  • २. दान्त
  • ३. प्रदान्त
  • ४. स्नात
  • ५. सौल
  • ६. ब्रह्मदाबल
  • ७. शौनक
  • ८. देवदर्शत और
  • ९.चरणविद्य’।

आचार्य सायण ने भी अपनी अथर्ववेद भाष्यभूमिका में इसकी नौ शाखाएँ ही स्वीकार की हैं; परंतु उनके नाम चरण व्यूह में बताए गये नामों से किंचित् भिन्न हैं, वैसे अधिकांश विद्वानों ने आचार्य सायण द्वारा उल्लिखित नामों को प्रामाणिक माना है। वे इस प्रकार हैं –

  • १. पैप्पलाद
  • २. तौद
  • ३. मौद
  • ४. शौनकीय
  • ५. जाजल
  • ६.जलद
  • ७. ब्रह्मवेद
  • ८. देवदर्शी और
  • ९. चारणवैद्य।

इस प्रकार अथर्ववेद की कुल नौ शाखाएँ प्रसिद्ध हैं; किन्तु वर्तमान में दो शाखाओं से सम्बद्ध संहिता ही उपलब्ध होती है, अन्य सात शाखाओं की संहिताएँ उपलब्ध नहीं होती।

जो दो शाखाएँ उपलब्ध हैं, उनमें भी एक शौनक संहिता ही आज की प्रचलित संहिता है, दूसरी पैप्पलाद संहिता यदा-कदा किसी पुस्तकालय में ही दर्शनार्थ उपलब्ध होती है, पठन-पाठन हेतु नहीं। इस प्रकार प्रमुख उपलब्ध संहिता शौनकीय ही है, इसके तथा अन्यों के विषय में उपलब्ध संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत है।

. पिप्पलाद संहिता – ‘प्रपञ्चहृदय’ नामक ग्रन्थ में इस संहिता की उपलब्ध जानकारी उपनिबद्ध है। उसके अनुसार इस संहिता के आदि मुनि प्रसिद्ध अध्यात्मवेत्ता ‘पिप्पलाद’ जी हैं । बीस काण्डात्मक इस संहिता की एक मात्र प्रति कश्मीर में उपलब्ध हुई, जो शारदा लिपि में थी, जिसे कश्मीर नरेश ने प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् डॉ० राथ को १८८५ में उपहार स्वरूप प्रदान की थी। उसी की फोटो कॉपी तीन प्रति में सन् १९०१ ई० में डॉ० राथ महोदय ने छपाई थी। महाभाष्य के अनुसार इस संहिता का प्रथम मन्त्र ‘शन्नो देवी रभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभिस्रवन्तु न:’ है। छान्दोग्य मंत्र भाष्य में भी इसी मंत्र को पिप्पलाद संहिता का प्रथम मंत्र स्वीकार किया गया है – ‘शन्नो देवी’…. अथर्ववेदादिमन्त्रोऽयं पिप्पलाददृष्टः।’ आज कल की प्रचलित संहिता (शौनक) में यह मंत्र प्रथम काण्ड के षष्ठ सूक्त के पहले मंत्र के रूप में उपलब्ध है।

२. शौनक संहिता – गोपथ ब्राह्मण तथा आजकल की प्रचलित अथर्व संहिता इसी शौनक शाखा की ही है। इस संहिता में २० काण्ड हैं, जबकि अनेक विद्वान् इसे अष्टादश काण्डात्मक ही मानते हैं। उनका कहना है कि उन्नीसवाँ और बीसवाँ काण्ड ‘खिल काण्ड’ हैं, जो पीछे से अथर्ववेद में सम्मिलित कर लिये गए; किन्तु अन्तत: २० काण्डीय संहिता को मान्यता दे दी गयी है।

इसके सूक्तों के विषय में मत – वैभिन्य है। बृहत्सर्वानुक्रमणी के अनुसार इसमें ७५९ सूक्त है, परंतु वैदिक यन्त्रालय अजमेर से प्रकाशित संहिता में ७३१ सूक्त हैं। कई समीक्षकों ने ७३० सूक्त ही माने हैं। वेदाध्ययन परम्परा को गतिशील बनाने में स्वामी गंगेश्वरानन्द जी का अपूर्व योगदान है। उन्होंने चारों वेदों को एक जिल्द में प्रकाशित कराया है, उनके अथर्ववेद में ७३६ सूक्त उपलब्ध हैं।

इन सभी संहिताओं की विवेकसम्मत समीक्षा ७५९ सूक्त मानने के पक्ष में जाती है। इसका सबसे बड़ा कारण ‘बृहत्सर्वानुक्रमणी’ का समर्थन है, साथ ही वेदों तथा वैदिक साहित्य के शोध एवं प्रकाशन की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य करने वाले वैदिक शोध संस्थान, साधु आश्रम, होशियारपुर, पंजाब से प्रकाशित सायणाचार्यकृत भाष्य सहित अथर्व संहिता है। इससे पूर्व सन् १९२९ में सनातन धर्म यन्त्रालय, मुरादाबाद से प्रकाशित अथर्व संहिता में भी ७५९ सूक्त ही प्राप्त होते हैं। इसी आधार पर प्रस्तुत संहिता में भी सूक्त की संख्या ७५९ रखी गई है। सामान्यत: अथर्ववेद में ६००० मंत्र होने का उल्लेख पाया जाता है। किसी-किसी संहिता में ५९८७ मंत्र मिलते हैं (स्वाध्याय मंडल पारडी, बलसाड़ गुजरात – बड़ा टाइप – बड़ी साइज); किन्तु प्रचलित संहिता में मंत्र संख्या ५९७७ ही उपलब्ध होती है। इस संहिता का दक्षिण भारत में विशेष प्रचलन है। आचार्य सायण का भाष्य भी इसी संहिता पर उपलब्ध है।

अथर्ववेद की अन्य संहिताएँ

अथर्ववेद की उक्त दो प्रमुख संहिताओं के अतिरिक्त, जिन अन्य सात संहिताओं (शाखाओं) का उल्लेख मिलता है, वे नाम मात्र के लिए ही हैं। ‘मौद’ संहिता का उल्लेख महाभाष्य (४.१.८६) तथा शाबर भाष्य(१.१.३०) में मिलता है। अथर्व परिशिष्ट में मौद तथा जलद शाखा वालों को पुरोहित न बनाने के रूप में उल्लेख मिलता है। वहाँ इनसे राष्ट्र के विनाश की आशंका व्यक्त की गई है। अथर्व की अन्तिम शाखा चारण-वैद्या के विषय में कौशिक सूत्र (६.३७) की व्याख्या तथा अथर्व परिशिष्ट (२२.२) से कुछ जानकारी मिलती है। वायु पुराणानुसार इस संहिता में ६०२६ मन्त्र थे; परंतु इस संहिता की कोई प्रति उपलब्ध नहीं। अन्य शाखाएँ तौद,जाजल, ब्रह्मवद तथा देवदर्श केवल नामत: प्रसिद्ध हैं, उनका कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होता।

अथर्ववेद के भाष्यकार

अथर्ववेद के भाष्यकारों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है – १. प्राचीन २. अर्वाचीन।

सायण – अथर्ववेद के प्राचीन भाष्यकारों में एक मात्र आचार्य सायण (१४वीं शताब्दी) का भाष्य ही उपलब्ध होता है, वह भी लगभग दो तिहाई पर ही, एक तिहाई पर उपलब्ध नहीं है। जिस पर सायण भाष्य उपलब्ध नहीं, वे काण्ड हैं – ५,९,१०,१२,१३, १४,१५ तथा १६। इनके अतिरिक्त ८वें तथा २०वें काण्ड पर सायण भाष्य आंशिक रूप से ही उपलब्ध है।

सायण भाष्य पर आधारित तीन संहिताएँ प्रकाशित हैं – १.निर्णय सागर प्रेस सं० स्व० शंकर पाण्डुरंग पण्डित १८९५-९८ ई० २. सनातन धर्म यन्त्रालय मुरादाबाद (उ०प्र०) सं० श्री रामचन्द्र शर्मा १९२९ ई० तथा ३.विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान होशियारपुर (पंजाब) सं० श्री विश्वबन्धु १९६०-६४ ई०। अर्वाचीन भाष्यकारों में पाश्चात्य तथा भारतीय विद्वान् दोनों हैं। उनका संक्षिप्त परिचय निम्नांकित है-

१. ग्रिफिथ – सम्पूर्ण अथर्ववेद का अंग्रेजी अनुवाद आर०टी० एच० ग्रिफिथ ने दो भागों में बनारस से प्रकाशित किया (१८९५-९६ई०)।

२. ह्विटनी – सम्पूर्ण अथर्ववेद का अंग्रेजी अनुवाद डब्ल्यू० डी० ह्विटनी ने किया, जिसका संपादन सी० आर० लानमन ने किया (१९०५ ई०)।

३.ब्लूमफील्ड – अथर्ववेद का अधिकांश भाग अंग्रेजी में एम० ब्लूमफील्ड ने अनुवादित किया।

४. ल्यूडविश – अथर्ववेद का जर्मन भाषा में अनुवाद ए० ल्यूडविश और जे० ग्रिल ने किया।

५. सातवलेकर – ‘अथर्ववेद का सुबोध भाष्य’ नाम से एक विस्तृत भाष्य श्री श्रीपाददामोदर सातवलेकर जी ने बड़े आयासपूर्वक सम्पन्न किया।

६. जयदेव विद्यालंकार – पं० जयदेव शर्मा ने अथर्ववेद का भाष्य आर्य साहित्य मण्डल लिमिटेड, अजमेर से प्रकाशित किया है।

अथर्ववेद का विषय – विभागक्रम

अथर्व संहिता का विभाग क्रम दो प्रकार से है- १. काण्ड, सूक्त तथा मन्त्र और २. काण्ड, अनुवाक, प्रपाठक, सूक्त तथा मन्त्र। सम्पूर्ण अथर्ववेद २० काण्डात्मक है । काण्ड, सूक्त और मन्त्र का विभाजन ही सुगम और सर्वमान्य प्रतीत होता है। दूसरा काण्ड, अनुवाक, प्रपाठक, सूक्त और मन्त्रात्मक विभाजन पारायण (पाठ) की सुविधा के लिए किया गया प्रतीत होता है, जो आज उतना लोकप्रिय नहीं है, न सुविधापूर्ण ही। अथर्ववेद को रचनाक्रम की दृष्टि से चार भागों में बाँटा जा सकता है-

(i) प्रथम भाग – (१ से ७ काण्ड) – इस विभाग में छोटे-छोटे सूक्त हैं। प्रथम काण्ड के प्रत्येक सूक्त में ४ मन्त्र, द्वितीय काण्ड में ५ मंत्र, तृतीय काण्ड में ६ मन्त्र, चतुर्थ काण्ड में ७ मन्त्र तथा पंचम काण्ड में ८ मन्त्र हैं। षष्ठ काण्ड के प्रत्येक सूक्त में कम से कम ३ मन्त्र हैं । सप्तम काण्ड में अधिकांशत: सूक्त १ या २ मन्त्र के ही हैं।

(ii) द्वितीय भाग (८ से १२ काण्ड) – ये सभी काण्ड बड़े-बड़े सूक्तों वाले हैं, परंतु प्रत्येक काण्ड एवं सूक्तों के विषय भिन्न-भिन्न विषयों वाले हैं। १२वें काण्ड के प्रारम्भ में पृथ्वी-सूक्त है, जो ६३ मन्त्रों वाला है, जिसमें भौगोलिक परिदृश्यों एवं राजनैतिक सिद्धांतों का वर्णन है।

(ii) तृतीय भाग (१३ से १८ काण्ड) – इस भाग के प्रत्येक काण्डों के सूक्तों में विषयों की एकरूपता है। १३वें काण्ड में अध्यात्म विषयक मन्त्र हैं। १४वें काण्ड में विवाह विषयक मन्त्र है। १५वें काण्ड में व्रात्यों के यज्ञ विषयक आध्यात्मिक मन्त्र हैं। १६ वें काण्ड में दुःस्वप्ननाशक मन्त्र हैं। १७ वा ३० मन्त्रों वाला एक सूक्तात्मक है, जिसमें सम्मोहन मन्त्र है । १८वें काण्ड में अन्त्येष्टि एवं पितृमेध विषयक मन्त्र है।

(iv) चतुर्थ भाग(१९ से २० काण्ड) -१९वें काण्ड में भैषज्य, राष्ट्रवृद्धि तथा अध्यात्म विषयक मन्त्र हैं। २०वें कांड में सोमयाग विषयक मन्त्र है तथा अधिकांश मन्त्र ऋग्वेद के हैं अथवा ऋग्वेद की ऋचाओं से साम्य रखते हैं।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि अथर्ववेद के मन्त्र तीन प्रमुख विषयों का प्रतिपादन करते हैं –

(i ) भेषज अर्थात् रोग दूर करने वाली ओषधियों का प्रतिपादन (ii) अमृत अर्थात् मृत्यु को दूर करने के साधन का प्रतिपादन और (ii) ब्रह्म अर्थात् बृहद् – सर्वश्रेष्ठ ज्ञान का प्रतिपादन। एक वाक्य में अथर्ववेद के मंत्रों का माहात्म्य अथवा वर्ण्यविषय का प्रतिपादन करते हुए अथर्व परिशिष्टकार ने लिखा है –

अथर्वमंत्रसम्प्राप्त्या सर्वसिद्धिर्भविष्यति (अथर्व.परि.२.५) अर्थात् अथर्ववेदमंत्र की सम्प्राप्ति (सम्यक् ज्ञान) से सब पुरुषार्थ सिद्ध होंगे।

वर्ण्य विषय -अथर्ववेद के वर्ण्य विषयों का क्षेत्र बहुत व्यापक है । सायणाचार्य ने उसको १४ विभागों में विभक्त किया है। बाद में अध्येता विद्वानों की सूची में २९ विषयों का उल्लेख है।

कौशिक सूत्रानुसार अथर्ववेद के १४ वर्ण्य – विषय

१.यज्ञानुष्ठान एवं संस्कार २.पौष्टिक कर्म ३. अनिष्टनिवारण एवं शान्तिकर्म ४. समृद्धि ५. राजव्यवस्था, ६. अभ्युदय एवं अभीष्टसिद्धि ७. शिक्षा ८. सामनस्य- ऐक्य भाव ९. भैषज्य १०.आभिचारिक प्रयोग ११. स्त्रीकल्याण १२. गृह-सज्जा १३. प्रायश्चित्त विधान १४. भविष्य कथन। कालान्तर में इन वर्ण्य-विषयों की और विशद विवेचना प्रस्तुत की गई। उस आधार पर अथर्व के उक्त १४ विषय बढ़कर २९ हो गये, जो इस प्रकार हैं-

१. पाक यज्ञ २. मेधाजनन प्रयोग ३. ब्रह्मचर्यसिद्धि ४. ग्राम नगर संवर्द्धन ५. पुत्र-कलत्र, प्रजा-पशु आदि की समृद्धि ६. सामंजस्य-ऐक्यभाव ७. राजकर्म ८. शत्रुसादन ९. संग्राम विजय १०. शस्त्र परिहरण ११. सैन्य- स्तम्भन १२. सैन्य-परिरक्षण १३. जय-पराजय विचार १४. सेनापत्यादिक कर्म,१५. सैन्य भेदनीति, १६. राजा की पुनः स्थापना १७. प्रायश्चित्त कर्म १८. कृषि आदि संवर्द्धन १९. गृहस्थ अभ्युदय २०. भैषज्य कर्म २१. संस्कार २२. सभा-जय साधन २३. वृष्टि – प्रयोग २४. अभ्युदय कर्म २५. वाणिज्यकर्म २६. ऋण विमोचन २७. अभिचार निवारण २८. आयुष्य कर्म २९. यज्ञानुष्ठान।।

अथर्ववेद के ये प्रमुख प्रतिपाद्य विषय हैं। इनके भी कई अवान्तर भेद-उपभेद हो सकते हैं, जिनकी संख्या बहुत हो सकती है, इन्हें देखकर निष्कर्षतः यही कहा जा सकता है कि यह वेद जीवन को समग्रता से जीने, बाधाओं को निरस्त करने एवं सुख-शांतिमय प्रगतिशील जीवन के सूत्रों की कुञ्जियाँ, अपने आप में सँजोये हुए हैं।

अथर्ववेद – ऋषि, देवता, छन्द

वेदार्थों को खोलने में ऋषि, देवता एवं छन्दों की अवधारणा का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। अथर्ववेद के ऋषि, देवता एवं छंदों की विशिष्टता पर एक दृष्टि डाल लेना उपयुक्त होगा।

ऋषि – अथर्ववेद के अधिकांश सूक्तों के ऋषि ‘अथर्वा’ (अविचल प्रज्ञायुक्त – स्थिरप्रज्ञ) ऋषि हैं। अन्य अनेक सूक्तों के ऋषियों के साथ भी अथर्वा का नाम संयुक्त है, जैसे अथर्वाचार्य, अथर्वाकृति, अथर्वाङ्गिरा, भृग्वङ्गिरा ब्रह्मा आदि ।अथर्ववेद के ऋषियों में बहुत से ऐसे नाम हैं ,जो व्यक्तिवाचक नहीं, भाववाचक – अशरीरी लगते हैं, जैसे नारायण, ब्रह्मा, भुवन, भुवन-साधन, भर्ग, आयु, यक्ष्मानाश, सूर्या, सावित्री आदि। स्पष्ट है कि मन्त्रद्रष्टा (मंत्रों के प्रथम प्राप्तकर्त्ता ) ने जिस चेतन धारा के साथ एकात्मता स्थापित करके मंत्र प्राप्त किए,उसी सचेतन दिव्य धारा को ऋषि माना, स्वयं को नहीं। उन्हें वे चेतन धाराएँ मूर्तिमान् व्यक्तित्वयुक्त प्रतीत होती रही होंगी।

देवता – अथर्ववेद में देवताओं की संख्या अन्य वेदों की अपेक्षा दोगुनी से भी अधिक है। यह इसलिए भी है, कि इसके वर्ण्य विषय बहुत अधिक हैं, जिसे लक्ष्य करके मंत्र कहा जाता है, उसे देवता कहते हैं। अत: उनका भाववाचक होना, तो आम बात है, किंतु अथर्ववेद में देवताओं के संबोधन कुछ विचित्रता लिए हुए हैं, जैसे अज (अजन्मा), मातृनामा, ईष्योंपनयन, यक्ष्मनाशन, कृत्यादूषण, कालात्मा, कामात्मा, शतौदनागौ, सप्त ऋषिगण, सभा आदि।

मन्त्राथों के संदर्भ में जहाँ देवताओं की अवधारणा स्पष्ट करने की आवश्यकता अनुभव की गयी है, वहाँ उनको स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है, आवश्यकतानुसार टिप्पणियाँ लगा दी गई हैं।

छन्द – अथर्ववेद में छन्दों की विविधता भी अन्य वेदों की अपेक्षा बहुत अधिक है। अनेक छन्द ऐसे हैं ,जिनका उल्लेख छन्दः शास्त्र के उपलब्ध ग्रन्थों में नहीं मिलता। कुछ छन्द ऐसे हैं, जिन्हें कई छन्दों को मिलाकर रचा गया है। संभवत: ऋषि को अपनी अभिव्यक्ति के लिए ऐसा करना आवश्यक हो गया होगा। कुन्ताप सूक्त (काण्ड २० सू० १२९) में तो मन्त्रांश हैं और कहीं पर तो एक-एक शब्द के ही मंत्र हैं । उन्हें छन्दों की किसी स्थापित धारा में प्रायः नहीं लिया जा सकता, उनके अर्थों का बोध भी दुरूह है।

अथर्ववेद – मंत्रार्थ की शैली

अथर्ववेद का सूत्र ग्रंथ ‘कौशिक सूत्र’ है। उसमें मंत्रों के विशिष्ट प्रयोगों का उल्लेख किया गया है। आचार्य सायण ने मंत्रों के अर्थ बहुधा कौशिक सूत्र में वर्णित उनके प्रयोगों के आधार पर किये हैं। आचार्य सायण की प्रतिभा एवं महत्ता को नमन करते हुए भी यह कहना पड़ता है कि मंत्रार्थ की यह शैली सटीक नहीं है। किसी मंत्र का अर्थ अलग बात है तथा उसका उपयोग किसी विशिष्ट प्रक्रिया में किया जाना कुछ और ही बात है । जैसे- पुरुष सूक्त के मन्त्रों से षोडशोपचार पूजन करने की परम्परा है। सूक्त में वर्णित परमपुरुष परमात्मा की विराट् सत्ता का चिंतन करते हुए पूजन की क्रियाएँ सम्पन्न करना बिल्कुल ठीक है; किन्तु यदि विभिन्न मन्त्रों के अर्थ उनके साथ की जाने वाली क्रियाओं के अनुसार किया जायेगा, तो पुरुष सूक्त के साथ न्याय नहीं हो सकता। ‘नाभ्याऽसीद् अन्तरिक्षं’ मंत्र का अर्थ नैवैद्य चढ़ाने की क्रियापरक कैसे हो सकता है? *’सप्तास्यासन्परिधयस्त्रि; सप्त समिधः कृताः’* मंत्र से परिक्रमापरक अर्थ कैसे निकलेगा?

सभी लोग जानते हैं कि राष्ट्रीय ध्वज फहराते ही सभी लोग सलामी देते हुए राष्ट्रगान गाते हैं। इस आधार पर यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का अर्थ झण्डा फहराने तथा सलामी देने की क्रियापरक करने लगे, तो बात कैसे बनेगी? झण्डे की सलामी की प्रक्रिया के साथ राष्ट्रगान गाने की परम्परा सही होते हुए भी, उसका अर्थ उस प्रक्रिया से अलग ही होगा। अस्तु, अथर्ववेद के मंत्रार्थ में कौशिक सूत्र में वर्णित प्रयोगपरक अर्थों की ओर जबरदस्ती मोड़ना उचित नहीं प्रतीत होता।

इसी प्रकार कुछ अर्वाचीन विद्वानों ने मंत्रों के अर्थआग्रहपूर्वक आध्यात्मिक संदर्भ में ही किये हैं। कुछ मंत्र जो क्रियापरक हैं, उनके भी आध्यात्मिक अर्थ निकल तो आते हैं, किन्तु मन्त्रार्थों की स्वाभाविकता उससे खंडित होती है। प्रस्तुत भाषानुवाद में मंत्रों की स्वाभाविक धारा को बनाये रखकर, उनके अर्थ करने का प्रयास किया गया है। वेदमंत्र अनेकार्थक तो होते ही हैं। आलंकारिक ढंग से, किन्हीं स्थूल वस्तुओं या प्रक्रियाओं के हवाले से गूढ़ रहस्यों को समझाना ऋषियों की विशेषता रही है। द्रष्टाओं के उदाहरण को भी ठीक से समझ पाना बड़ा कठिन होता है। उन्हें भाष्य-शैली में स्पष्ट करना भी कठिन होता है, भाषार्थ शैली में तो यह कार्य और भी दुरूह हो जाता है। फिर भी यथास्थान टिप्पणियों द्वारा उन्हें स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है, ताकि अध्येताओं को उन काव्यात्मक अलंकारों के भाव समझने में सुविधा हो इसे वेदभगवान् की कृपा ही कहा जा सकता है।

मणि– अनेक प्रकार की मणियों का प्रयोग तथा उनकी महत्ता अथर्ववेद के अनेक सूक्तों में वर्णित है। मणि को तैयार करने, प्राप्त करने तथा धारण करने के स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं। मणि सम्बोधन वेद में व्यापक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। वनस्पतियों एवं ओषधियों से निर्मित मणियों का भी उल्लेख है। उन्हें मंत्रशक्ति से अनुप्राणित भी किया जाता है; किन्तु कुछ मणियों को तो दिव्य गुणों-दिव्य शक्तियों के रूप में ही मानना पड़ता है। यह परम्परा भारतीय वाङ्मय में रही भी है । जैसे रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है-

‘रामनाम मणि दीप धरु जीह देहरी द्वार’* तथा *’मंत्र महामणि विषय ब्याल के….’

उक्त पदों में रामनाम एवं मंत्रादि को मणि कहा गया है। अथर्ववेद में भी साक्त्यमणि (८.५.३) एवं त्रिसंध्या मणि आदि संबोधन ऐसी ही शक्ति बीजरूप मणियों के लिए प्रयुक्त प्रतीत होते हैं। मणि प्रसंगों में संदर्भानुसार उनके स्वरूप को स्पष्ट करते हुए मंत्रार्थ खोलने का प्रयास किया गया है।

मातृनामा -मातृनामा का उल्लेख सूक्त ४.२० के ऋषि एवं देवता के रूप में किया गया है। कुछ आचार्यों ने इस सम्बोधन को मंत्रों में वर्णित त्रिसन्ध्या एवं सदम्पुष्पा मणियों से जोड़ा है। हितकारिणी ओषधियों को मातृनामा (माता जैसे- प्रभावशाली) कहना उचित है। फिर भी विभिन्न मंत्रों में उनके प्रभाव के विवरण के आधार पर उन्हें मातृसत्तात्मक दिव्य प्रवाह ही मानना युक्तिसंगत लगता है। इस अवधारणा के आधार पर मंत्रार्थ स्वाभाविक रूप में सिद्ध हो जाते हैं।

कृत्यादूषण – अनेक सूक्तों के देवता के रूप में यह सम्बोधन प्रयुक्त हुआ है। कृत्यादूषण – ‘कृत्या’ अथवा उसके प्रभाव को नष्ट करने के प्रयोग अनेक स्थानों पर आये हैं। कृत्य’काअर्थ होता है,करने योग्य क्रिया और कृत्या दूषण का अर्थ हुआ किये हुए की प्रतिक्रिया। इस आशय से ‘कृत्या’ का प्रयोग भले-बुरे दोनों अर्थों में किया जा सकता है, किन्तु ‘कृत्या’ शब्द का प्रयोग किसी हानिकारक मारक शक्ति के रूप में ही किया जाता रहा है । शत्रुनाश के लिए ‘कृत्या’ प्रयोग तो निश्चित रूप से ‘मारक’ संकल्प के साथ किये गये कार्यों के वाञ्छित प्रतिफलों के साथ कुछ अवाञ्छित फल भी निकल पड़ते हैं, उन्हें भी ‘कृत्या’ कह सकते हैं। जैसे समुद्र मन्थन रत्नों की प्राप्ति के संकल्प के साथ किया गया था; किन्तु उससे हलाहल विष भी निकल पड़ा, अच्छे उत्पादन के प्रयास में फैक्ट्रियों से प्रदूषण भी निकल पड़ता है। मनुष्य में कर्म संकल्प एवं कर्मशक्ति के विकास के लिए काया, इन्द्रियाँ तथा कामनाएँ आवश्यक हैं। उनके इष्ट प्रयोगों के साथ अनिष्ट प्रयोग भी होने लगते हैं, उन्हें भी ‘कृत्या’ कह सकते हैं। प्रजनन द्वारा सृष्टि कार्य आगे बढ़ाने के लिए प्रदत्त कामशक्ति, कामवासना बनकर अनिष्टकारी बन जाती है, उसे भी ‘कृत्या’ कह सकते हैं। इस प्रकार कृत्या के स्थूल-सूक्ष्म अगणित स्वरूप सिद्ध हो सकते हैं।

किसी उपजी ‘कृत्या’ अथवा ‘कृत्यादूषण’ का शमन आवश्यक हो जाता है। वेद द्वारा कुत्या निवारण को इसी प्रकार के व्यापक संदर्भ में लेने से वेदमंत्रों के अर्थ भली प्रकार प्रकट हो सकते हैं। किसी एक परम्परा में प्रयुक्त प्रयोगों तक उसे सीमाबद्ध करना उचित नहीं लगता, अस्तु, प्रस्तुत वेदार्थ में परम्परा के साथ व्यापक प्रयोगों को समाहित रखने का प्रयास किया गया है।

ब्रह्मजाया – अथर्व० ५.१७ में देवता ब्रह्मजाया का वर्णन है। जाया का सीधा अर्थ पत्नी होता है। ब्रह्म की पत्नी अथवा ब्राह्मण की पत्नी के संदर्भ से संगति ठीक-ठीक बैठती नहीं। उसे ‘ब्रह्मविद्या’ के संदर्भ में लेने से मंत्रार्थों की गरिमा तथा परम्परागत अर्थ दोनों की संगति ठीक बैठ जाती है।

ब्रह्मगवी :-सूक्त ५.१८ के देवता रूप में वर्णित ब्रह्मगवी का अर्थ ब्राह्मण की गाय अधिकांश विद्वान करते हैं। गौ माता के प्रति श्रद्धा तथा उनकी महत्ता बढ़ाने के लिए मंत्रों में वर्णित असामान्य प्रभावों को ‘गौ’ से जोड़ना उचित भी है; किन्तु मन्त्रों के भाव इस अर्थ के साथ ठीक प्रकार सिद्ध नहीं होते। ब्राह्मण की गाय जो उसको पोषण देती है, वह उसकी निष्ठा- प्रवृत्ति है। इसलिए ‘ब्रह्मगवी’ का अर्थ *’ब्रह्म वृत्ति’* लेने से ही बात बनती है। इसी प्रकार ‘शतौदना’ गौ, वशा गौ, स्कम्भ आदि के बारे में व्यापक पूर्वाग्रहमुक्त होकर ही अर्थ करने पड़े हैं, अध्येताओं को उनसे तुष्टि के साथ नयी दृष्टि भी मिल सकेगी, ऐसी आशा है। मंत्रों के बीच-बीच में भी आलंकारिक प्रयोगों को टिप्पणियों के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। जैसे अथर्व० ४.७.३ में रोगी को परामर्श दिया गया है कि भूख के अनुसार करंभ(औषधियुक्त खाद्य का मिश्रण) खाने और पीवपाक (चर्बी पकाने) विधि का प्रयोग तुम्हे विष प्रभाव से बचा लेगा। यहाँ चर्बी पकाने की विधि का यह स्पष्टीकरण आवश्यक है- अन्यथा कोई नासमझ चर्बी पकाकर उसका करंभ(मिश्रण) बनाकर शारीरिक विषों से मुक्ति चाह सकता है। पाद टिप्पणी में यह बात स्पष्ट कर दी गयी है कि भरपूर श्रम, जिससे शरीर की चर्बी गलने लगे, ऐसे प्रयोग को ‘पीवपाक’ कहा जाना युक्तिसंगत है। स्थान-स्थान पर ऐसे स्पष्टीकरण देने वाली टिप्पणियों का संतुलित प्रयोग किया गया है।

अथर्ववेद संहिता – कुछ रहस्यात्मक प्रसंग

वेद यों तो सारे के सारे गूढ़ हैं, उनके मर्म को समझना कठिन है, फिर भी उनकी भाषा के आधार पर उनके भावों को कुछ अंशों तक समझ लिया जाता है; किन्तु अथर्व में ऐसे अनेक रहस्यात्मक प्रकरण हैं, जिनको न समझ पाने के कारण भ्रम उत्पन्न होते हैं।

जादू टोने का भ्रम – अथर्ववेद में बाधाओं से बचने तथा दुष्टों के दमन के क्रम में अनेक रहस्यात्मक प्रयोगों का उल्लेख है। कुछ विदेशी विद्वान् इस आधार पर इसमें जादू – टोना होने का आरोप लगाते हैं, कुछ लोग इसे दूसरों को हानि पहुँचाने की हीन- विधाओं का समर्थक कहते हैं, किन्तु विवेकपूर्ण समीक्षा से ऐसे सब आरोप निरर्थक सिद्ध हो जाते हैं।

सब जानते हैं, कि संसार में भले-बुरे सभी तरह के लोग भी हैं तथा अच्छे-बुरे सभी तरह के स्थूल-सूक्ष्म प्रवाह भी हैं। स्वयं को सदाचारी बनाकर नीतिनिष्ठ तथा समर्थ बनाना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है, दुष्टवृत्तियों-दुष्प्रयासों से अपने आप को बचाना। इसके लिए आत्मरक्षा के उपायों के साथ-साथ कभी-कभी आक्रामक रुख बनाना पड़ता है। रोग से बचने के साथ-साथ रोग पर मारक आक्रमण भी करने पड़ते हैं । दुरुपयोग से तो बुद्धि भी कुचक्र रचने वाली बन जाती है और सदुपयोग करने से घृणा भी दोषों से बचा लेती है। अस्तु , विकारों तथा विकृत प्रक्रियाओं को नष्ट करने के प्रयासों को हीन प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता। उस विद्या का भी विवेकपूर्ण उपयोग समय-समय पर अत्यंत आवश्यक हो जाता है। जादू तो हमारे अज्ञान का परिचायक है । लोग विज्ञान के तथा हाथ की सफाई के तमाम कौशल दिखाते हैं । समझने वालों के लिए वे कौशल, सुनिश्चित प्रक्रियाएँ हैं और न समझ पाने वालों के लिए जादू हैं।

यदि किसी ने ‘इलैक्ट्रोस्टेट’ मशीन न देखी हो और कोई जानकार उसे समझाए कि यहाँ से सादा कागज डालो – उधर से छपा हुआ निकाल लो, तो अनजान व्यक्ति यही कहेगा कि जादूगरी करके हमें बहका रहा है; किन्तु सत्य तो सत्य है, जो उसे जानता है, वह तो व्यक्त करने का प्रयास करेगा ही। वेद में ऋषियों ने अपनी सांकेतिक भाषा में (जो उस समय सहज ग्राह्य रही होगी) उपयोगी बातें बतलायी हैं। हमारी बुद्धि जितना समझ पाए, उसका लाभ उठाए; किन्तु जो बातें हम समझ नहीं पाते, उन्हें किन्हीं हीन परिकल्पनाओं से जोड़ना उचित नहीं। दूसरी बात यह है कि जादू शब्द हमेशा बुरे अर्थों में ही प्रयुक्त नहीं होता। यदि कोई बालक या व्यक्ति किसी भी प्रकार कोई उचित बात समझ नहीं रहा है, ऐसे में कोई मनोवैज्ञानिक मेधा- सम्पन्न व्यक्ति उसे सहमत कर ले, तो लोग हर्षित होकर कह उठते हैं वाह ! इसने तो जादु कर दिया। माँ का – संतों का अपनत्व भरा व्यवहार ऐसे जादू करता ही रहता है। उपचार पद्धतियों में आज भी अनेक प्रक्रियाएँ जादू जैसी लगती हैं। होम्योपैथी में रसायन विज्ञान (कैमिस्ट्री) के हिसाब से देखें, तो १००० शक्ति (पौटैन्सी) की दवा में एक घन सेन्टीमीटर द्रव में मुश्किल से ओषधि का एक कण (मालीक्यूल) आता है। उस द्रव की छोटी बूंद में तो दवा कुछ भी नहीं रह जाती,फिर वह असर कैसे करती है ? यह बात समझ में न आने से जादू जैसी लगे भले, किन्तु है तो एक सूक्ष्म विज्ञान के अनुशासन में ही। इसी प्रकार एक्सरे, इंफ्रारेड, अल्ट्रा वायलेट एवं लेसर किरणों से किया जाने वाला उपचार अज्ञानियों को जादू जैसा लगे भले ही, किन्तु है तो वह विज्ञान सम्मत प्रक्रिया ही।’

वेदकाल में ऐसी सूक्ष्म चिकित्साओं की श्रेणी में प्राण तथा मन्त्र की सूक्ष्म धाराओं का प्रयोग सहज ही किया जाता रहा है । वे शक्तियाँ पवित्र जीवन जीने वाले, प्रकृति के संसर्ग में रहने वाले तपस्वी स्तर के व्यक्तियों को सहज उपलब्ध रहती थीं। अत: वे ओषधियों, मणियों आदि के साथ उन सूक्ष्म धाराओं को संयुक्त करके उपचार किया करते थे। आज वह प्रक्रिया हमारे लिए दुरूह हो गयी है, तो भी उसे नकारा नहीं जा सकता। अथर्ववेद में ऐसे प्रसंग भी पर्याप्त है। मन्त्रार्थों में ऐसे प्रसंगों को चेतना विज्ञान की ऐसी धाराएँ मानकर चला गया है, जो फिलहाल स्पष्ट नहीं हो पायी है।

दुर्बोध शब्दावली – अथर्ववेद में अनेक ऐसे मन्त्र हैं, जिनके अर्थ एवं उद्देश्य तो सहज ही स्पष्ट हो जाते हैं, किन्तु उनमें जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है, उनके अर्थ खोजे नहीं मिलते। निरुक्तकार यास्क भी उस संदर्भ में मौन हैं। ताबुव एवं तस्तुव के सर्पविषनाश की बात बहुत स्पष्टता से कही गयी है, किन्तु ये क्या हैं ? अब तक किसी व्याख्याकार की समझ में नहीं आया। इसी प्रकार के कुछ शब्द हैं – खृगल, विशफ, काबव, कर्शफ आदि। ओषधि प्रयोगों में अनेक ऐसी ओषधियों का वर्णन किया गया है, जिनका उल्लेख किसी भैषज्यग्रंथ में नहीं मिलता, जैसे अरंधुष, अरुन्धती, उपजीका, अश्ववार आदि । मणियों के संदर्भ में भी जंगिड़ मणि, प्रतिसरमणि अस्तृतमणि की भावात्मक व्याख्या करके ही चुप रह जाना पड़ता है। आलंकारिक, सांकेतिक शब्दावली जैसे – कोकयातु (चक्रवाक पक्षी जैसी कामवृत्ति),सुर्पायातु (गरुड़ जैसा दर्प), श्वयातु (कुत्ते की तरह जातिद्रोह) आदि को यथा स्थान स्पष्ट किया गया है।

अथर्ववेद २०वें काण्ड के सूक्त क्र० १२७ से क्र० १३६ तक के सूक्तों को *कुन्ताप सूक्त* कहते हैं। कुछ विद्वान् इन्हें ‘खिल’ (प्रक्षिप्त) मानते हैं; किन्तु कालान्तर में इन्हें संहिता का ही अंग स्वीकार कर लिया गया ह। आचार्य सायण के भाष्य में इन सूक्तों पर भाष्य प्राप्त नहीं है, अथर्ववेद के ही कुछ अन्य सूक्तों पर भी उनके भाष्य प्राप्त नहीं हैं। हो सकता है कि उनके भाष्य के कुछ अंश काल-प्रभाव से नष्ट हो गये हों ? जो भी हो, किन्तु अब वे सभी मान्यता प्राप्त संहिताओं में हैं तथा अध्येताओं-विद्वानों के लिए चुनौती भरे आकर्षण बने हुए हैं। सभी ने उन्हें दुरूह-दुर्बोध माना है। गोपथ ब्राह्मण, उत्तरभाग, प्रपाठक ६, कण्डिका १२.४ में कुन्ताप का अर्थ *’कुयान् तप्यन्ते’* कुत्सित- निन्दित (पापों) को तापित (तपाकर भस्म) करने वाला बतलाया गया है। इससे यज्ञानुष्ठान कर्त्ता के पापों को भस्म किया जाता है। वैतान सूत्र (६.२) के अनुसार इसका प्रयोग सोमयागों के छठवें दिन ‘पृष्ठ्य’ स्तुतियों के रूप में किया गया है। सूत्रकार ने इस सूक्त समुच्चय के सूक्तों को इस प्रकार अलग-अलग विभागों में विभक्त किया है – सू० क्र० १२७-२८ कुन्ताप; सू० क्र० १२९,३०,३१,३२ एतश, सू० क्र० १३३ प्रवह्लिका, सू० क्र० १३४ प्रतिराधा, सू० क्र.१३५ अतिवाद तथा सू० क्र० १३६ आहनस्य कहे गये हैं।

इन सूक्तों में गेय पद वाले मंत्रों से लेकर एक-एक शब्द वाले मन्त्र तक हैं। जैसे – प्ररित्रय: (१२९.८) पृदाकव: (१२९.९), पाकबलिः, शाकबलि: (१३१.१५-१६) आदि।

भारत की ऋषि-परम्परा में यह कोई अनहोनी बात नहीं है। तत्त्वदशी ऋषियों ने तो उच्चारण एवं भावना या संकल्पशक्ति के संयोग से कार्य करने वाले एकाक्षर मंत्र (ह्रीं, श्री, क्लीं, हुं आदि) भी रचे हैं, तो एक शाब्दिक मंत्रों को अटपटा क्यों माने ? एकाक्षर मंत्रों की तरह इनके भी प्रयोग हो सकते हैं; किन्तु शब्द में अर्थात्मक सूत्र भी सन्निहित होते हैं, उन्हें खोलने में कठिनाई होना स्वाभाविक है, फिर भी देशकाल की आवश्यकता के अनुरूप वेद मंत्रों ने अपना जितना स्वरूप खोला है, उतने को भावानुरूप भाषा देने का प्रयास किया गया है। सभी वेदों की तरह अथर्ववेद में भी पदार्थ विज्ञान, मनोविज्ञान एवं चेतना विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को सांकेतिक विधि से व्यक्त किया गया है । आशा है इस प्रयास से जनसामान्य को वेदज्ञान का लाभ उठाने तथा गहन अध्येताओं को शोध के नये आयाम प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। सभी को वेदों की सांस्कृतिक गरिमा तथा उपयोगिता का बोध हो सकेगा।

गायत्री तपोभूमि से वेदों के प्रथम सर्वसुलभ संस्करण प्रकाशित करते समय पू० गुरुदेव ने इच्छा व्यक्त की थी कि समय आने पर विशिष्ट टिप्पणियों सहित वेदों के नये संस्करण छापेंगे। उसके लिए वे ऐसे सूत्र बनाकर दे गये थे, जिनके आधार पर इस कार्य का सम्पन्न होना संभव हुआ। वे शरीर के बंधनों में आबद्ध रहकर भी सहस्रों बुद्धियों तथा हाथों से कार्य लेते रहे, उन बन्धनों से मुक्त होकर तो उनकी वह शक्ति और भी प्रखर हो उठी। उन्होंने मानों हाथ पकड़ कर यह सब करा लिया। ‘नेति-नेति’ कहे जाने वाले तत्त्व को उन्होंने किस मर्यादा के अनुसार कितना खोला, यह तो वे ही जानें, किन्तु पंचभूतों की यह काया अपनी आयु समाप्त होने के पूर्व उनकी कठपुतली के रूप में अपनी यह भूमिका भी निभा पायी, इसका संतोष अवश्य है।

आनो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

अथर्ववेद-संहिता परिचय वन्दनीया माता भगवती देवी शर्मा

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